दो बटेर


दो बटेर

एक बार की बात है। किसी गांव में एक संत रहते थे। उनका बड़ा नाम था। दूर-दराज से लोगबाग उनसे आशिर्वाद लेने आते थे। एक उनके पास दो आदमी आये। उन्होंने संत से कहा कि गुरू जी आप हम दोनों का अपना शिष्या बना लो। उन्होंने संत से बहुत प्रार्थना कि परंतु गुरू जी ने उन दोनों को अपना शिष्य बनाने से इंकार कर दिया। अंत में दोनों ने सुबह से शाम तक गुरू जी का शिष्य बनने के लिये और हाथ जोड़े कहा कि गुरू जी आप जैसा बोलोगे हम वही करेंगे। हम दोनों गरीब लोगों की भलाई का कार्य करेंगे। हम दोनों कड़ी भक्ति कर अपना देश तथा समाज का भला करेंगे। हम दोनों पूरी जिंदगी गरीबों की सेवाओं में लगा देंगे। जब दोनों लोगों ने संत से काफी मन्नतें की तब जाकर गुरू जी बोले, आप मेरे शिष्य बनने के लायक नहीं हैं। क्योंकि आप सच का साथ नहीं दे सकते। आप में इतनी हिम्मत नहीं है आप सच का साथ दें। क्योंकि सच हमेशा अच्छे लोगों की परीक्षा लेता है और जो व्यक्ति इस परीक्षा में पास हो जाता है वह सदा-सदा के लिये अमर और अजर हो जाता है। 
अब जब दोनों लोगों ने संत से खूब प्रार्थना करी तो संत भी उन्हंे अपना शिष्य बनाने को तैयार हो गये। परंतु संत ने उनसे कहा कि मैं आपको अपना शिष्य बनाने से पहले एक परीक्षा लूंगा। दोनों परीक्षा देने को तैयार हो गये। गुरू जी ने दोनों लोगों को दो बटेर दिये और बोले कि आप इन दोनों बटेर को ले जाओ और ऐसे स्थान पर इन्हें मारकर लाना जहां इन्हें कोई भी नहीं देख सके। दोनांे आदमी अपने-अपने बटेर को लेकर संत के आश्रम से चल दिये। एक व्यक्ति अपने बटेर को लिये ऐसे स्थान पर गया जहां उसे कोई राहगीर के साथ-साथ कुत्ता, बिल्ली या चिड़िया भी नजर नहीं रही थी। उसने सोचा कि गुरू जी ने कहा कि इस बटेर को ऐसे स्थान पर मारकर लाना जहां कोई भी नहीं देख सके। पहले व्यक्ति ने ऐसा ही किया और एकतरफ बैठकर अपने बटेर की नाड़ पकड़ी और उसे मार दिया। मरा हुआ बटेर लेकर वह गुरू जी के पास पहुंचा और बोला गुरू जी लो मैं अपने बटेर को मारकर ले आया हूं अब आप मुझे अपना शिष्य बना लो। गुरू जी बोले दूसरा व्यक्ति कहां हैं वह बोला पता नहीं गुरू जी वह कुछ रास्ते तक मेरे साथ चला फिर पता नहीं वह अपने बटेर को लेकर कहां चला गया। मैंने तो अपना काम कर दिया जो अब आपके सामने है। गुरू जी बोले चलो ठीक हो आप वहां आश्रम में अपने मरे हुए बटेर के साथ बैठ जाओ। जब तक आपका दूसरा साथी अपने बटेर को लेकर नहीं आता। अब जब दूसरा व्यक्ति सोचता-सोचता आश्रम से बहुत दूर निकल गया जहां बहुत बड़ा जंगल ही जंगल था। वहां घनघौर अंधेरा था। अंधेरे के साथ-साथ गहरा जंगल अब उस व्यक्ति को गुरू जी की कही हुई बातें याद आईं कि उन्होंने कहा था कि अपने बटेर को ऐसे स्थान पर मारकर लाना जहां कोई देख सके। अब वह अपने बटेर को लेकर पेड़ के नीचे बैठ गया और जैसे ही वह अपने बटेर की नाड़ मरोड़ने लगा तो कटेर उसे देखता है और वह बटेर को देखता है उसे याद आया कि गुरू जी ने तो कहा कि इसे ऐसे स्थान पर मारकर लाना जहां कोई भी नहीं देख सके। उसने अपना जीवित बटेर लिया और वापिस आश्रम की ओर चल दिया। आश्रम में पहुंचकर वह गुरू जी से बोला गुरू जी आपने कहा था कि इसे ऐसे स्थान पर मारकर लाना जहां कोई भी नहीं देख सके। परंतु मैं बहुत दूर गया जहां चारो ओर जंगल ही जंगल था जैसे ही मैं इसे मारने लगा तो ये मुझे देखता और मैं इसे देखता मुझे तो ऐसी धरती पर कोई जगह नहीं जहां कोई कोई हो और जो सबका मालिक ऊपर बैठा है वह तो सबको देख रहा है मैं चला अपने घर मुझे आपका शिष्य नहीं बनना है। गुरू जी बोले आप मेरे शिष्य बनने लायक हो। वह दूसरा व्यक्ति मेरे शिष्य बनने लायक नहीं है। इस कहानी का यह मतलब है कि ईश्वर हर जगह है उससे कोई भी चीज छुपी नहीं है। इसलिये हमें जानबूझकर कभी गलती नहीं करनी चाहिए। जो ऐसा करते हैं वह वास्तव में विद्वान तो हो ही नहीं सकता बल्कि वह सबसे बड़ा मूख होता है। - सुदेश वर्मा




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