चरवाह की मौत

चरवाह की मौत
किसी गांव में एक चरवाह रहता था। वह सुबह अपनी पशुओं को चराने को जंगल में ले जाता था और शाम को वापस अपने गांव आ जाता था। वह बहुत खुश था। परंतु उसे झूठ बोलने की बहुत बुरी आदत थी। एक बार वह अपने पशुओं को जंगल में चराने के लिये ले गया। उसने सोचा क्यों न अपने गांव वालों को झूठ बोलकर बेवकूफ बनाया जाये। उसने दोपहर के समय ऐसा ही किया कि बचाओ-बचाओ शेर आ गया और मेरी भेड़-बकरियों को खा रहा है मुझे बचाओ-बचाओ। सभी गांव के लोग उसकी आवाज को सुनकर अपने हाथों में लाठी ठंडें लेकर जंगल की तरफ चरवाह तथा उसके जानवरों को बचाने दौड़ पड़े जब गांव वाले जंगल में पहुंचे तो वह चरवाह उन हंसने लगा और कहने लगा कि देखों मैंने सभी गांव वालों को कैसा बेवकूफ बनाया है। उसने एक-दो बार ऐसा ही किया। उसकी बातों पर किसी को अब भरोसा न रहा। और फिर एक जब चरवाह अपनी भेड़-बकरियों तथा जानवरों को जंगल में चराने के लिये ले गया तो वास्तव में एक दिन शेर आ गया और उसके पशुओं को खाने लगा जब उसने डरकर खूब जोर-जोर से चिल्लाया कि शेर आ, शेर गया मुझे बचाओ-मुझे बचाओ अबकी बार गांव वाले नहीं आये क्योंकि वह सभी गांव वालों को कई बार मूर्ख बना चुका था। अंत में शेर ने चरवाह को भी खा लिया और उसकी मौत हो गई। कहानी में कहने का तात्पर्य यह है कि हमें कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए क्योंकि झूठ बोलना पाप है। झूठ की कोई सीमा नहीं होती और अंत में जीत हमेशा सच्चाई की होती है। तभी तो एक कहावत है कि झूठ चले सौ कोस और सच्चाई चले एक कोस। एक सच लाख झूठ के बराबर होता है। 
- सुदेश वर्मा

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